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Showing posts from April, 2020

सिविल प्रक्रिया संहिता

सन् 1859 की सिविल प्रक्रिया संहिता अनेकों बार संशोधित की गई सन् 1877 में संशोधित सिविल प्रक्रिया संहिता देश का कानून बन गई लेकिन परिस्थितियों में परिवर्तनों के साथ-साथ इसमें और संशोधनों की आवश्यकता प्रतीत हुई । इसलिए सन् 1908 में इनमें और संशोधन किये गये एवं आज हमारे समक्ष सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 है। लेकिन देरी तथा व्यय को कम करने के उद्देश्य से संहिता में सन् 1956 में संशोधन किये गये और संशोधित अधिनियम को 2 दिसम्बर, 1956 को भारत के राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली तथा पहली जनवरी, 1957 को इन्हें लागू किया गया। सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के दो भाग हैं-प्रथम भाग और द्वितीय भाग । प्रथम भाग में 158 धाराएं हैं। इसे संहिता का मुख्य अंग कहते हैं । प्रथम भाग सामान्य सिद्धांतों का उल्लेख करता है तथा इन्हीं व्यवस्थाओं के आधार पर क्षेत्राधिकार निर्धारित किया जाता है। प्रथम भाग प्रकृति से सारभूत है जो संसद के सिवाय किसी के द्वारा परिवर्तित या संशोधित नहीं किया जा सकता है । द्वितीय भाग में 51 आदेशों का संकलन है। इसे प्रथम अनुसूची में रखा गया है। इन आदेशों को नियम कहते हैं। द्वितीय भाग में क...

न्यायिक प्रक्रिया में उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक निर्णयों का प्रभाव

भारत के संविधान की अनुच्छेद 151 का प्रोविजन है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा घोषित नियम या सिद्धान्त भारत के राज्य-क्षेत्रान्तर्गत सभी न्यायालयों पर लागू होगा । उसी प्रकार किसी उच्च न्यायालय का कोई निर्णय उसी कोर्ट के किसी डिवीजन बेंच तथा उसके अधीनस्थ सभी न्यायालयों पर भी लागू होगा । एक उच्च न्यायालय का निर्णय यद्यपि दूसरे न्यायालय पर बाइन्डिंग नहीं है तथापि अत्यधिक आदरणीय रहता है । अधीनस्थ न्यायालय अपने उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धान्त के अर्थ का अनुसरण करने में बँधे हुए है जहाँ इसके अपने उच्च न्यायालय का कोई निर्णय नहीं है वहाँ निचला न्यायालय अन्य उच्च न्यायालयों के निर्णयों का अनुशरण करता है । उच्च न्यायालय का अप्रतिवेदित फैसला भी अथोरिटी के रूप में उतना ही अच्छा है जितना रिपोर्टेड होता है । इस सम्बन्ध में एक ख्याति प्राप्त न्यायाधीश ने माना है कि फैसला कमो-वेश एक अथोरिटी है भले ही उसको रिपोर्ट नहीं किया गया । यह हमेशा अवश्य स्मरण रखा जाना चाहिए कि कोई भी फैसला कानून को बदल नहीं सकता रिपोर्ट एक अथॉरिटी  के रूप में प्रयोग उस समय होता है जब उसमें कतिपय लीगल प्रिन...

मुकदमें का ब्रीफ तैयार कैसे करे :-

क्रीमवुड मियर्स के निम्न विचार है :- 1. मुकदमों के तथ्यों के विषय में सामान्य परिचय प्राप्त करने के बाद एडवोकेट को सर्वप्रथम अपनी संचिका या फ़ाइल को एरेन्ज करके उसके प्रत्येक पृष्ट को संख्याकित कर लेना चाहिए । 2.  तैयार किये जानेवाले फाइल पर दोनों पक्षों के नाम रेखाकित भी कर लेना चाहिए जिसका केस आपको मिला रहता है। उसके नीचे अपने दस्तावेजों की सूची भी लिख ले और साथ-साथ गवाहों के नामों की सूची भी तैयार कर लें। 3. उसो कागज पर तालिकाबद्ध विवरणी तैयार करें जिसमें चार खाने हो । एक में तारीख दूसरे में साचित किये जानेवाले फैक्ट्स तीसरे में कब और किससे साबित कराये जायें और चौथे में प्रसंग कॉलम न०-2 महत्वपूर्ण फैक्ट्स को साबित करने के लिए विशिष्टता होनी चाहिए अर्थात् प्रकाश में लाने के लिए बल दिये जाये और वे बातें जो आपक पक्ष में हो उन्हें नीली  रोशनाई से अन्डर लाईन कर दं और जो आपके प्रतिकुल दिखे  उन्हें लाल से अन्डर लाईन कर दें । उसके बाद आपके गवाहान और उन्हें जो कुछ भी साबित करना है उन सभी बातों को अगले कॉलम में नोट करें । महत्वपूर्ण बातो को अनिवार्यताएँ जैसे किसी मुकदमें में...

बुनियादी बातें

मैंने सन 2011 से वकालत कर रहा हूँ काफी उतार चढ़ाव देखने के बाद नए अधिवक्ताओं के लिए यह ब्लॉग मैंने बनाया और अपने अनुभव आपसे साझा कर रहा हूँ | जो लोग विधि व्यवसाय का चुनाव अपनी पसंद से करते है एवं दृढ़ संकल्प के साथ जाखिम को जानते हुए इस व्यवसाय में आते हैं वे हो इस पेशे  में सफल हो पाते हैं। जो व्यक्ति अपना धैर्य खो देता है ते इस पेशा में टिक नहीं पाता है इस पेशे में नये अधिवक्ताओं को बड़े धैर्य का साथ गहन अध्ययन करते हुए प्रतीक्षाकाल व्यतीत करना चाहिए क्योंकि एक न एक दिन सभी को चमकने का अवसर मिलता है प्रत्येक अधिवक्ता को प्रतिदिन न्यायालय में पहले पहुँच जाना चाहिए और न्यायालय बद होने के बाद आना चाहिए । एक अधिवक्ता को पेटु  पाठक अवश्य होना चाहिए । लॉर्ड बाउथम के अनुसार-एक अधिवक्ता  को कुछ विषय के बारे में सब कुछ और प्रत्येक चीज के बार में कुछ चीज अवश्य जानना चाहिए। वकालत करना पत्थर में शहद निकालने के समान है । सिर्फ लॉ की डिग्री और कोर्ट के पहन लेने से सफलता नहीं मिल पाती प्रत्येक सफलता के बाद सफलता का मापदंड बदल जाता है । हकीकत तो यह है कि क्लाइंट अधिवक्ता के कानून की जान...